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यौन उत्पीड़न के मामले में मीडिया ट्रायल नही हो , लेकिन दोषी संस्थान और व्यक्ति बच नही पाए
यौन उत्पीड़न के मामलें मीडिया ट्रायल नही हो, लेकिन दोषी संस्थान और व्यक्ति बच नही पाए

(अनिल सक्सेना/ललकार)

अभी कुछ दिन पूर्व मेरे पास एक यूनिवर्सिटी से संबधित मामले में एक युवती के यौन उत्पीड़न की जानकारी मिली, यहां तक पुलिस में प्राथमिकी और जांच की भी गहन जानकारी मिली और पुलिस द्वारा रिमांड लेने की बात भी सामने आई। मामला कई दिनों से कानूनी प्रक्रिया में चल रहा है लेकिन इसकी गूंज सुनी नही तो थोड़ा आश्चर्य हुआ ।

पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता से बात हुई तो उसने बताया कि पीड़ित आत्महत्या कर सकती है इसलिए मामले को मीडिया के सामने नही लाना चाहते । सभी ने आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साधे हुई है ।

मेरे द्वारा एक चिकित्सक से जानकारी लेने पर उन्होने बताया कि यौन उत्पीड़न के शिकार लोग डिप्रेशन में जा सकतें है, कई बार वो जिंदगी भर उस वाकये को नही भूल पाते और उन्हे सेक्सुअल डिसआॅर्डर हो सकता है, आत्मविश्वास भी खत्म हो जाता हैं । चिकित्सक यह भी बताते है कि हमारे समाज में समस्या यह है कि सेक्स जैसे मसलों पर बात नही होती । बच्चों को सबसे पहले यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी शिकायत को सुना जाएगा और उसके बाद उसे डांट नही पड़ेगी । इसलिए हमेशा ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिससे बच्चे अपनी परेशानी आसानी से अभिभावकों से जाहिर कर सके ।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड टं्रप ने सुप्रीम कोर्ट के जज बे्रट कैवनाॅ पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों मे कहा था कि पीड़ित को उसी समय शिकायत करनी चाहिए थी, इस पर ट्रंप का सोशल मीडिया मंे बहुत विरोध हुआ था ।

गत वर्ष तमिलनाडु के पोलाची यौन उत्पीड़न व ब्लैकमेलिंग मामले में सरकार को सीबीआई जांच के आदेश देने पड़े थे । इस मामले में भी एक युवती ने ही पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी । बाद में जांच करने पर पूरा गिरोह सामने आया, जो कई युवतियों की जिंदगी को बर्बाद कर चुके थे । सवाल यह है कि क्या इस मामले में भी कोई गिरोह काम कर रहा है ?

हम सभी जानते है कि यौन शोषण के मामले में मीडिया में पीड़ित पक्ष और उसके परिवार की पहचान नही बताई जाती है । क्या पुलिस मीडिया ट्रायल से बचना चाहती है ? सवाल बहुत है लेकिन हम तो यही चाहते है कि जो भी अपराधी हो उसे कानूनी रूप से कड़ी से कड़ी सजा मिले और जिस शिक्षा के मंदिर का मामला है, उसे भी जनता के समक्ष लाया जाए, जिससे माता-पिता सजग हो । हमे हिंदुस्तान के कानून पर विश्वास है कि पीड़ित पक्ष को पूरा न्याय मिलेगा और पुलिस के द्वारा मामले की तह तक जाकर मामले का पटाक्षेप होकर सत्य सामने आकर रहेगा । जनता के मन की तो एक ही बात कि यौन उत्पीड़न के मामलें मीडिया ट्रायल नही हो, लेकिन दोषी संस्थान और व्यक्ति बच भी नही पाए।

(लेखक अनिल सक्सेना राजस्थान के सबसे पुराने सन् 1949 से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार “ललकार” के संपादक और राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के संस्थापक अध्यक्ष है। )

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