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राजस्थान में कौन जीता और कौन हारा
राजस्थान में कौन जीता और कौन हारा

(अनिल सक्सेना/ललकार)

राजस्थान की राजनीति में अन्दरखाने घमासान की तैयारियां कांग्रेस की सरकार बनने के कुछ दिनों बाद ही होनी शुरू हो गई थी लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शायद इसकी गंभीरता देर से समझ पाए । माना यह जा रहा है कि इस बार वे कुछ ज्यादा आत्मविश्वासी हो गए और इसलिए ही उनकी सरकार को यह संकट देखना पड़ा। दूसरी ओर यह भी कह सकते है कि गहलोत ने समय रहते मामले को संभाल लिया । यहां यह भी कहना पड़ेगा कि अगर मुख्यमंत्री गहलोत के स्थान पर और कोई होता तो इस संकट से निजात नही पा सकता था और यह भी सत्य है कि इस संकट से बचाने में अहम भूमिका राजस्थान के प्रभारी अविनाश पांडे ने निभाई।

अब कांग्रेस सरकार वर्तमान में तो संकट से उबरती नजर आ रही है लेकिन देखना यह है कि अविनाश पांडे और गहलोत की आगे की रणनीति से असंतुष्ट विधायक किस तरह से संतुष्ट हो पाते है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा तो वे सचिन पायलट ही है, जिन्होने गुस्से में आकर बिना ठोस योजना के यह कदम उठाया । वहीं सचिन के द्वारा इन दिनों में कांग्रेस या अन्य किसी कांग्रेसी नेता पर कोई टिप्पणी नही करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा ही माना जाएगा, जिसका उन्हे लाभ मिला और कांग्रेस में ही रहने का मौका भी मिला । गहलोत को पटखनी देने की सचिन की योजना उनके ही विश्वासपात्र विधायकों के कारण मिटटी में मिल गई, जिन्हे उन्होने आगे बढ़ाया और यह सब अविनाश पांडे और गहलोत की सफल रणनीति के कारण ही हो पाया ।

जयपुर के होटल और जैसलमेर में अशोक गहलोत गुट में रहने वाले विधायकों में कुछ कांग्रेसी विधायक गहलोत सरकार से संतुष्ट नही थे लेकिन यह मानना पड़ेगा कि कुछ अंसतुष्ट विधायकों ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ कोई कदम नही उठाया और वे सरकार और कांग्रेस के साथ बने रहे । सबसे पहले ऐसे विधायकों को राजनीतिक रूप से एडजस्ट करना जरूरी होगा और सरकार में एडजस्ट करने से संदेश भी यह जाएगा कि सरकार और पार्टी के साथ बने रहने का लाभ ही होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार के संकटकाल में जिन्होने भी साथ दिया उन्हे पारितोषिक देना जरूरी है। ऐसे विधायकों की जानकारी अविनाश पांडे और गहलोत दोनो को ही है।

राजनीति के जानकार यह भी बताते है कि कुछ हद तक देखा जाए तो कांग्रेस में दोनो ही गुट की हार हुई है । एक तो गहलोत समय रहते घटनाक्रम को होने से बचा नही पाए जबकी सरकार के मुखिया वही है और उन्हे जानकारी भी थी कि ऐसा हो सकता है दूसरी ओर बड़े सपने देखने वाले सचिन कांग्रेस सरकार के लिए बड़ा संकट खड़ा करके सब कुछ गंवाकर वापस घर को लौट आए ।

इस पूरे प्रकरण को देखे तो यह भी साफ है कि अभी गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटा देना कांग्रेस आलाकमान के लिए भी संभव नही है और ना ही कोई दूसरा सरकार चला सकता है। वहीं राजस्थान प्रभारी के रूप में अविनाश पांडे ने समय-समय पर कांग्रेस सरकार को बचाने का कार्य किया और इस संकटकाल में ंअपनी सफल रणनीति के तहत कांग्रेस विधायकों को एक रखने का कार्य किया, शायद दूसरा कोई प्रभारी ऐसा कर भी नही पाता ।

इधर इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा केन्द्रीय आलाकमान को समझ जाना चाहिए कि अभी तो राजस्थान में वसुंधरा राजे ही है जिनकी पकड़ प्रदेश की राजनीति के साथ ही विधायकों और पार्टी के नेताओं पर भी बनी हुई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया एक कुशल संगठक हो सकते है लेकिन प्रदेश के भाजपा नेताओं और प्रदेश की राजनीति पर पकड़ बनाने में समय लगेगा । दूसरी ओर केन्द्रीय मंत्री जोधपुर सांसद गजेन्द्र सिंह केन्द्र के सहयोग से प्रदेश की राजनीति पर पकड़ बनाने का प्रयास जरूर कर रहें है लेकिन वे अभी जोधपुर से आगे लोकप्रिय नही है। देखा जाए तो वसुंधरा राजे को दरकिनार करने की सोचने वाले प्रदेश के भाजपा नेताओं को अभी तीन साल लगातार प्रदेश में काम करना चाहिए और अपनी छवि को जननेता की बनानी चाहिए जैसे कि वसुंधरा राजे की है , वे एक कुशल संगठक और जननेता दोनो ही है।

(लेखक अनिल सक्सेना राजस्थान के सबसे पुराने सन् 1949 से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार “ललकार” के संपादक और राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के संस्थापक अध्यक्ष है। )

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